भारत का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा? ये हैं 4+1 विकल्प

कुछ महीनों पहले तक इस सवाल का जवाब स्पष्ट था कि देश का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा। पर वर्तमान के चुनावी गणित के आधार पर, यह जबाव उतना स्पष्ट नहीं है। हम नजर डालते हैं विभिन्न संभानाओं पर – जिनमे से हर विकल्प मुमकिन है और जिसका प्रभाव देश के साथ-साथ हम सब के आर्थिक भविष्य पर पड़ेगा। आगामी चुनाव में बीजेपी द्वारा जीती गई सीटों की संख्या के आधार पर यह तय होगा कि देश का अगला प्रधानमंत्री कौन बनेगा।



परिदृश्य 1 : बीजेपी को 230 से अधिक सीटें हासिल होती हैं

इस परिदृश्य में, नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के रूप में बने रहेंगे क्योंकि वर्तमान सहयोगियों के साथ एनडीए को बहुमत हासिल होगा। हालांकि वर्त्तमान में सहयोगियों के बीच तनाव जरूर है, परंतु चुनाव के पहले सबकुछ ठीक हो जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उनके सहयोगियों पर कितना प्रभाव है, यह इस बात पर निर्भर होगा कि बीजेपी 2014 के अपने 282 के आंकड़े से कितना नज़दीक है। यदि बीजेपी को 2014 की तरह ही जीत हासिल करनी है तो एक बार फिर से आने वाले चुनाव को बीजेपी की लहर वाला चुनाव बनाना होगा।

परिदृश्य 2: बीजेपी को 200-230 सीटें हासिल होती हैं

इस परिद्श्य में, बीजेपी में अंदरूनी तनाव हो सकता है और अगला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जगह कोई और भी बन सकता है। ऐसा इसलिए हो मुमकिन है, क्योंकि एनडीए के बाहर की क्षेत्रीय पार्टियां जिनके सहयोग की आवश्यकता होगी सरकार के गठन के लिए, वे एक नए नेता की मांग कर सकते हैं चुकिं, अ) केबिनट में उनका अधिक से अधिक नियंत्रण बना रहे, और ब) वे अपने मतदातों को यह नहीं दिखा सकते कि एक तरफ वह मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी के खिलाफ हैं साथ ही दूसरी तरफ उन्हें अपना समर्थन भी दे रहे हैं । यह उनके लिए राजनीतिक रूप से नकारात्मक साबित हो सकता है।

कुछ ऐसा ही 2009 में भी देखने को मिला था, जब कांग्रेस को 206 सीटें हासिल हुई थी और कांग्रेस ने कई क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन किया था।

परिदृश्य 3: बीजेपी को 200 से कम सीटें हासिल होती हैं और कांग्रेस एक गठबंधन का नेतृत्व कर सकती है

इस परिदृश्य में राहुल गांधी देश के अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं। चूंकि बीजेपी + कांग्रेस आम तौर पर कुल 330 सीटें हासिल करती हैं, इसलिए अगर बीजेपी को 200 से कम सीटें हासिल होती हैं तो इसका मतलब होगा कि कांग्रेस को 130 के आस पास सीटों पर जीत हासिल है। ऐसा ही कुछ 2004 में भी देखने को मिला था, जहां कांग्रेस को 145 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। जिसके बाद कांग्रेस ने कई छोटी पार्टियों के समर्थन से यूपीए सरकार का गठन किया था। बीजेपी को बहुमत हासिल करने में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। क्योंकि यह देश की मुख्य पार्टी है और इसे अन्य कई क्षेत्रीय पार्टीयों के समर्थन की आवश्यकता होगी जो कि संभव नजर नहीं आ रहा। यहां मुख्य भूमिका तमिलनाडू व पश्चिम बंगाल की है, और चुनाव के बाद डीएमके और टीएमसी द्वारा लिए गए निर्णय पर। चुकिं इन दोनों पार्टीयों के पास तकरीबन 30-35 सीटें होंगी और कुल मिलाकर 60-70 सीटें।

परिदृश्य 4: बीजेपी को 200 से कम सीटें प्राप्त होती हैं और कांग्रेस गठबंधन करने में असमर्थ हो

इस तरह का माहौल हमें 1996 में ले जाएगा। 1996 में क्षेत्रीय पार्टीयों ने उस समय की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बीजेपी को अपना समर्थन देने से इनकार कर दिया था। अगर इस बार भी क्षेत्रीय पार्टीयों ने देश की दो सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी – बीजेपी और कांग्रेस को अपना समर्थन देने से इनकार कर दिया तो, इन 15-20 क्षेत्रीय पार्टीयों को एक साथ आकर, बीजेपी या कांग्रेस के बाहरी समर्थन से गठबंधन कर सरकार का गठन करना होगा।

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2009 में यह बात जोरो पर थी कि कांग्रेस हमेशा सरकार में रहेगी, क्योंकि बीजेपी 116 सीटों पर सिमट कर रह गयी थी। ऐसा ही माहौल 2014 में भी बना था जब ऐसा प्रतीत होता था कि अब बस बीजेपी ही सत्ता पर आसीन रहेगी, क्योंकि कांग्रेस केवल 44 सीटों पर सिमट कर रह गई थी। पर हालिया सर्वेक्षण के आधार पर, अगले चुनाव के लिए आम जनता के बीच सामान्य अंसोसष की भावना है। हालांकि बीजेपी अभी भी चुनाव जीत रही है – पर भारत में चुनाव के समय आम तौर पर सरकार के खिलाफ ही परिणाम देखने को मिले हैं।

परिदृश्य 5: देश के युवाओं द्वारा नया आंदोलन जो कई नेतृत्व की संभावनाएं पैदा करता है

पांचवा विकल्प सबसे दिलचस्प है, यदि देश की युवा परिर्वतन के लिए एक नया आंदोलन का नेतृत्व करे। भारतीय मतदाताओं को आज कुछ नए विचारों का इंतज़ार है। और आज के युवाओं को नए अवसरों की तलाश है। इसके अलावा वे समृद्धि और तेज गति से सरकारी कार्यप्रणाली में बदलाव लाना चाहते हैं। परंपरागत रूप से लोकालुभावन नीतियां मतदाताओं की आकांक्षाओं को पूरा नहीं करेंगी। यह सही समय है कि हम देश की राजनीतिक कार्यप्रणाली को एक नयी दिशा दें। व्हाट्स एपप और फेसबुक के माध्यम से आज अधिक से अधिक भारतीय मतदाताओं तक पहुंचा जा सकता है, और कम से कम हर परिवार का एक सदस्य इससे जुड़ा हुआ है। यदि वे इस निर्णय पर पहुंच गए कि वर्तमान में कोई भी राजनीतिक पार्टी उनके उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई है, तो तेजी से नए विचारों और नेताओं का विकल्प आम लोगों के सामने आ सकता है।

तो आइए अब देखें की भारत के 100 करोड़ मतदाताओं का वोटिंग का ढांचा कैसा है। लगभग एक तिहाई मतदाता हमेशा से एक ही पार्टी के समर्थक रहे हैं – 17 करोड़ बीजेपी के, 8 करोड़ कांग्रेस के और 8 करोड़ विभिन्न क्षेत्रीय पार्टीयों के। इसके अलावा तकरीबन 33 करोड़ लोग मतदान देने के लिए घर से निकलते ही नहीं है। क्या परिणाम होगा यदि ऐसा कुछ किया जाए कि वे मतदान के लिए प्रेरित हो? ये 33 करोड़ मतदाता वर्तमान में किसी भी राजनीतिक पार्टी के समर्थक नहीं है। और आखिरी के मतदाताओं का एक बड़ा तबका, उन 33 करोड़ लोगों का है जो या तो अनिश्चत मतदाता है या अपना मत एक स्वतंत्र उम्मीदवार को देते हैं जिनके जीत की उम्मीद ना के बराबर हो।

यही 67 करोड़ बिखरे मतदाता आगामी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। ये मतदाता बीजेपी के समर्थको के मुकाबले 4 गुना और कांग्रेस के समर्थको के मुकाबले 8 गुना अधिक है।

इसलिए मेरा मानना है कि अगले चुनाव के परिणाम के बारे में निश्चित रूप से कुछ भी कह पाना संभव नहीं है।

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