ये हैं वह 10+1 कार्ड जो नरेंद्र मोदी अगले प्रधानमंत्री बने रहने के लिए खेल सकते हैं

जैसा कि आपने मेरी पिछली वाख्या में देखा था, अगले चुनाव में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने रहने के लिए यह सुनिश्चत करना होगा कि एनडीए के सहयोग के साथ भाजपा को 230 से अधिक सीटें मिले। 230 से कम सीटें हासिल होने पर भाजपा में अंदरूनी संर्घष देखा जा सकता है

जैसा कि आपने मेरी पिछली वाख्या में देखा था, अगले चुनाव में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने रहने के लिए यह सुनिश्चत करना होगा कि एनडीए के सहयोग के साथ भाजपा को 230 से अधिक सीटें मिले। 230 से कम सीटें हासिल होने पर भाजपा में अंदरूनी संर्घष देखा जा सकता है जिससे अ) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने खराब प्रर्दशन की नैतिक जिम्मेदारी लेने की आवश्यकता होगी और ब) इसके अलावा कई क्षेत्रीय पार्टीयों के सहयोग की आवश्यकता पड़ेगी जिनका समर्थन देने के लिए अपने कुछ शर्तें होंगी।

मेरा विश्वास है कि भाजपा को तकरीबन 215 से 225 सीटें हासिल होंगी, जिससे भाजपा को 272+ के जादुई आंकड़े को हासिल करने के लिए कई तरह के श्रृंखलाबद्ध कार्यों को अंजाम देना होगा। इसे हासिल करने के लिए भाजपा क्या करेगी?

यह कुल वह 10 कार्ड है, जिसे भाजपा द्वारा अगले चुनाव में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाए रखने के लिए खेला जा सकता है।

1. करिश्मा कार्ड

राजनैतिक गलियारों में नरेंद्र मोदी एक मात्र राष्ट्रीय नेता के रूप में प्रसिद्ध हैं। हर महत्वाकांक्षी दावेदार को व्यवस्थित रूप से भाजपा के भीतर और बाहर समाप्त कर दिया गया। प्रधानमंत्री अपने समर्थकों के बीच एक पंथ की तरह जाने जाते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि- दूसरा विकल्प क्या है? यदि मोदी नहीं, तो कौन? यदि बीजेपी नहीं तो कौन? यहां तक की राज्य के चुनाव भी प्रधानमंत्री के नाम पर लड़े जा रहे हैं। इतिहास का चक्र एक बार फिर 1970 और इंदिरा गांधी के काल में पहुंच गया है। इसलिए यह व्यक्तिगत ज्यादा और बाकी सब कम हो गया है। हालांकि लोगों में अंसोतष की भावना अधिक है लेकिन इतना गुस्सा नहीं है कि आम जनता किसी और को चुने। सवाल यह है कि –क्या करिश्मा के आधार पर 2014 की तरह अधिक से अधिक लोगों को भाजपा को मतदान देने के लिए प्रेरित किया जा सकेगा या वह घर पर ही रहेंगे? सबसे ज्यादा ध्यान विशिष्ट चयनकर्ताओं पर होगा – विशेषकर ग्रामीण महिलाओं और पहली बार मतदान करने वालो पर।

2. कांग्रेस कार्ड

चुनाव विकल्पों का खेल है- मतदाताओं को मौजुदा विकल्पों में से चयन करना होता है। भारत में अधिकतर मतदाताओं के लिए, यह चुनाव भाजपा और कांग्रेस के बीच रहता है। इसलिए भाजपा को मतदाताओं की नजर में अच्छे बने रहना है और यह याद दिलाना है कि कांग्रेस भारत के लिए किस तरह खराब रही है। इसलिए कांग्रेस पर विभिन्न तरह के हमले बड़ सकते हैं, जो एक तरह से सही भी हैं। इसके अलावा एक औऱ मुद्दा यह होगा कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद देश को समृद्धि की राह पर ले जाने के लिए भाजपा का रिकॉर्ड।

3. भ्रष्टाचार कार्ड

कांग्रेस को लक्ष्य बनाने के साथ-साथ पिछले कुछ सालों में भाजपा सरकार द्वारा एक धारणा बनाई गई है कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध लड़ रहे हैं। बेशक, भारत में, भ्रष्टाचार कभी दूर नहीं हो सकता – यह केवल अदृश्य हो जाता है क्योंकि यह वितरित होने की बजाय, केंद्रीकृत हो जाता है। (वरना राजनीतिक पार्टीयां विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन कैसी करती है? हर राष्ट्रीय पार्टी को अगले लोकसभा चुनाव के लिए 10-15,000 करोड़ रूपयों की आवश्यकता होती है। आपको क्या लगता है यह पैसे कहां से आता है?) भाजपा इस मुद्दे पर कड़ी मेहनत करेगी- भ्रष्टाचार के लिए कुछ बड़े राजनेताओं और व्यापारियों को जेल करा अपना ट्रेक रिकॉर्ड अच्छा रखेगी, जैसा कि हाल की कुछ घटनाओं में देखने को मिला है।

4. गठबंधन का कार्ड

चुनाव पूर्व गठबंधन पर मुहर लगाना महत्वपूर्ण है। एक संबद्ध पार्टी द्वारा जीती जाने वाली प्रत्येक सीट एक ऐसी सीट है जो विपक्ष के पास नहीं जाती है – इस तरह से +2 लाभ सुनिश्चित किया जाता है। 2004 के अनुभव के आधार पर यह बात भाजपा से अच्छा कोई नहीं जानता। महाराष्ट्र में शिवसेना, बिहार में जेडीयू, आंध्रा प्रदेश में टीडीपी और पंजाब में शिरोमणी अकाली दल (अन्य छोटी पार्टीयों के साथ) का समर्थन देना जारी रहेगा, इसलिए चुनाव के पहले यह धारणा बना लेना सही नहीं होगा कि भाजपा ही अगले चुनाव की एकमात्र वीजेता है। कुछ राज्यों में भाजपा के नजरिए से चुनाव पूर्ण गठबंधन पर मुहर लगाना काफी महत्वपूर्ण है, लेकिन यह बहुत मजबूत नहीं है, अगर क्षेत्रीय दलों का मानना है कि भाजपा को स्वंय से बहुमत प्राप्त करने की संभावना नहीं है, फिर वे चुनाव होने तक का इंतजार कर सकते हैं। भाजपा के अनुसार और पार्टियों की संख्या के आधार पर, जिन पार्टीयों की सरकार बनाने की आवश्यकता होगी, वे समझौता करने की बेहतर स्थिति में होंगे, खासकर कुछ बड़े राज्यों के दल।

5. कटिंग कार्ड

चुनाव का छोटा सा ज्ञात तथ्य है वोट कटर्स का महत्व और स्थानीय मौन गठबंधन। हर चुनाव में कई उम्मीदवार व पार्टीयां होती है और उनका एक मात्र कार्य होता है- मत को विभाजित करना, जिससे मुख्य पार्टी के उम्मीदवारों के जीतने की संख्या कम हो जाए। भारतीय चुनाव में फर्स्ट पास्ट द पोस्ट प्रणाली का यही तथ्य है। हाल ही में गुजरात विधानसभा चुनावों में एनसीपी और बसपा जैसे दलों ने बहुत अच्छी तरह से इस कार्य को अंजाम दिया व कुछ सीटों पर भाजपा के उम्मीदवारों को आगे बढ़ने में सहायता की। यह भारत के सबसे बड़े राज्य के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो सकता है, उत्तर प्रदेश की 80 सीटों के साथ। भाजपा ने 71 सीटें जीती हैं, जिसमें 2 अतिरिक्त सीटें सहयोगी पार्टी की हैं। भाजपा का मुख्य उद्देश्य होगा कि बड़े राज्यों में भाजपा के खिलाफ अन्य पार्टीयां गठबंधन बना कर नहीं स्वतंत्र चुनाव लड़े। उत्तर प्रदेश में मायावती की बसपा महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। वह सीधे भाजपा के साथ सहयोग नहीं करेगी तथा अपने बलबुते वह बहुत सी सीटें नहीं जीत सकतीं, लेकिन सभी निर्वाचन क्षेत्रों में मजबूत उम्मीदवारों को स्थापित करने से, वह निश्चित रूप से भाजपा को कई और सीटें जीतना आसान कर सकती है।

6. उम्मीदवारों का कार्ड

जीत हासिल करने के अलावा एक तकनीक है किसी अन्य पार्टी के विशिष्ट सींटो से उम्मीदवारों को खरीदना। कोई भी राजनेता ज्यादा दिनों तक सत्ता से बाहर रहना पसंद नहीं करता। भाजपा के मानको के आधार पर उनके राष्ट्रीय दावेदार कांग्रेस है, इसलिए भाजपा राज्य स्तर पर कांग्रेस को कमजोर करने का हर प्रयास करेगी और उन कांग्रेस की सींटों का भाजपा में विलय करेगी, जिन पर उनके जीतने की संभावना कम है। आखिरकार, दोनों दल वैचारिक रूप से ज्यादा अलग नहीं है- कमांड, नियंत्रण और अधिकार उनके शासन काल में केंद्रीय स्तंभ रहे हैं। पंरतु कांग्रेस के उम्मीदवार स्थानीय उद्यमी होते हैं, यदि उन्हें ऐसा लगता है कि कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन कर रही है तो वे भाजपा में शामिल नहीं होंगे। सत्ता विरोधी लहर को रोकने के लिए एक तकनीक और है कि उम्मीदवारों का फेर-बदल करना। यह स्थानीय उम्मीदवारों के क्रोध को निर्दशित करने में सहायता प्रदान करता है। भाजपा शायद से 2019 में ऐसा ही करेगी-क्योंकि अधिकतर सांसद मोदी लहर के कारण चुनाव जीते हैं और नहीं उनका कोई अच्छा खासा ट्रेक रिकॉर्ड है। उनका आना-जाना लगा रहता है।

7. जाती का कार्ड

यह अमीर के खिलाफ गरीबों का दांव लगाने की पुरानी तकनीक है। हमारी फिल्मों ने यह अतीत में किया था, और हमारे राजनेता इस के स्वामी हैं। यह संदेश है, “अमीर अपने पैसे को अवैध तरीके से बनाते हैं और बहुत अधिक हिट हो जाते हैं। देखो, मैं कर लगाने और उनके लक्ष्य को कठिन बना रहा हूं, और अब आपको वह पैसा दूंगा। नोटबंदी के समय काले धन को लेकर भी यही धारणा बनाई गयी थी। भाजपा ने बड़ी ही चतुराई से अपने वोट बैंक अमीर वर्ग व मध्यम वर्ग से परिवर्तित कर गरीब वर्ग कर लिया है, जिनकी संख्या ज्यादा है, जो मतदान देते हैं और वफादार मतदाता है। जिससे बड़ी संख्या में अमीरो पर प्रहार किया जा रहा है इन सब में सबसे ज्यादा नुकसान मध्यमवर्गीय लोगों का होता है। भाजपा की धारणा शायद यह है कि चुनावों से पहले ही कुछ सपोर्टों के साथ उनका समर्थन खरीदा जा सकता है क्योंकि राजनेताओं को लगता है कि मध्यवर्गीय, हालिया उपहारों को छोड़कर ज्यादा याद नहीं रखता । उनकी धारणा के अलावा, दूसरा विकल्प क्या है? मध्यवर्गीय किसे मतदान देंगे? भ्रष्ट कांग्रेस को? मध्यवर्गीय वोट भाजपा के लिए है तो मुस्लिम वोट कांग्रेस के लिए होता है –जिसका हमेशा से फायदा उठाया जाता है।

8. पैसों का कार्ड

बजट में राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना और न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषणाओं के साथ राज्य स्तर पर कृषि ऋण में छूट का मुख्य उद्देश्य देश के गरीब और किसानों के हाथों में अधिक से अधिक पैसे उपलब्ध कराना मुख्य उद्देश्य है। इसे मुफ्त में उपहार मत कहिए-लेकिन वास्तव में यह यही है। चूंकि बीजेपी सरकार के पहले 6 महीनों में वास्तविक संरचनात्मक सुधार नहीं किए गए, भारतीय समृद्धि के रास्ते पर नहीं हैं। इसलिए, उनके मतों को खरीदा जाएगा। अन्य योजनाएं जैसे कि मुद्रा के तहत गरीब वर्ग को मुद्रा का वितरण किया जाएगा। यदि सब कुछ विफल हो जाता है- तो हमेशा कि तरह जन धन वापसी योजना की घोषणा की जा सकती है- जिससे प्रत्येक 30 करोड़ जन-धन खाते में 5000 रूपये का भुगतान किया जाएगा। इसके लिए अमीर, मध्यम वर्ग और व्यवसायियों पर अधिक से अधिक करों को थोपा जाएगा।

9. समुदाय का कार्ड

वोटों के लिए हिंदी-मुस्लिम विभाजन का शोषण और ध्रुवीकरण एक पुरानी कहानी है। कई दशकों से कांग्रेस ने मुस्लिम वोट बैंक का खेल खेला है, शुरूआत से ही 15 प्रतिशत समर्थन चुनाव में उन्हें मिलता आया है। भाजपा को इस बात का एहसास हुआ कि सिर्फ जाती स्तर पर एकत्रीकरण, मुकाबला करने के लिए पर्याप्त नहीं है। उन्हें जाति से ऊपर उठकर अधिक संख्यां में ध्रुवीकरण और मतदाताओं को एकजुट करने की आवश्यकता है, इसलिए इसमें सबसे पहले आता है-धर्म। अयोध्या राम मंदिर का निर्णय इस दिशा में उन्हें बढ़ने के लिए सही मौका देगा। इसके अलावा ट्रिपल तलाक पर ध्यान केंद्रित कर भाजपा नें मुस्लिम वोट बैंक को भी विभाजित करने की दिशा में कार्य करना शुरू कर दिया है। लोग अपने जाति के बारे में न सोचते हुए धर्म के बारे में सोचे इसके लिए अधिक प्रयासों की जरूरत होगी, जैसे-जैसे हम चुनाव के नजदीक होंगे वैसे-वैसे मतदाता पोंलिग बुथ के नजदीक।

10. देश का कार्ड

बाहरी धमकी की डर से ज्यादा ऐसा कुछ नहीं है जो देश की जनता को एकजुट कर सके। जैसे कि भारत-पाकिस्तान सीमा विवाद पर, एक साल पहले तक काफी कुछ बाते कही गई। यह मुद्दा चीन के आक्रमक प्रवेश के कारण बदल गया। चीन भारत में वैसा ही कर सकता है जैसा कि रसिया नें अमेरिका में किया था- अपने अनुसार परिणाम लाने के लिए हस्तक्षेप करना। डोकलाल सिर्फ पहला कदम है असल में पाकिस्तान में अब चीन का कवच (सुरक्षा) है, इसलिए सीमा के जरिए राष्ट्रवादी भावनाओं को झटका लगाया जा सकता है।

***

इसलिए यह वह 10 कार्ड है जिसका उपयोग भाजपा कर सकती है। मेरे विचार में, सबसे महत्वपूर्ण “ट्रंप कार्ड” वह है जो भाजपा को 230 + सीटो तर पहुंचा सकता है और नरेंद्र मोदी के लिए दूसरा कार्यकाल सुनिश्चित करता सकता है, जैसा कि मैंने पिछली बार अपने व्याख्यान में कहा था कि मई 2018 से पहले 100 दिनों में चुनाव हो सकते हैं।

एक सवाल यह उठता है कि ये 10 कार्ड नरेंद्र मोदी को भारत के प्रधान मंत्री के रूप में जारी रखने में मदद कर सकते हैं, लेकिन क्या वह भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री बनेंगे जो समृद्धि को बढ़ावा दे?

इसके साथ ही मैंने उन 10 कार्ड पर भी चर्चा की है जिसका उपयोग अगले चुनाव में राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जगह देश के अगले प्रधानमंत्री बनने के लिए कर सकते हैं