12 कारण जिससे अगले 100 दिनों में लोकसभा चुनाव हो सकते हैं

आगामी अप्रैल- मई 2019 में लोकसभा चुनाव निर्धारित किए गए हैं। लेकिन राजनीतिक गलियारों में ऐसी अटकलें थी कि यह चुनाव कुछ महीने पहले होंगे। हालांकि, मुझे लगता है कि यह चुनाव इसी साल, अगले कुछ महीनों में आयोजित किए जाएंगे। इसके कुछ कारण हैं।



इसके छह प्राथमिक कारण हैं तथा हालिया घटनाओं के आधार पर छह अनुमानित कारण।

ये हैं प्राथमिक कारण:

1. राज्य चुनाव के परिणाम अनिश्चित हैं- –यदि राज्यों के आधार पर भविष्य में भाजपा के प्रदर्शन का अनुमान लगया जाए तो, भाजपा के लिए 2014 की तरह 282 सीटों पर जीत दोहराना मुश्किल है। उत्तर व पश्चिम के कई राज्यों में भाजपा आसानी से जीतने में सक्षम है। यदि स्थानीय रिपोर्टों पर गौर किया जाए तो, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड के पांच राज्यों में भाजपा 40 से 50 सीटें गंवा सकती है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में भी 80 में से 71 सीटों (सहयोगियों के 2 अतिरिक्त सीटों के साथ) पर दुबारा जीत हालिल करना कठिन है। उपरोक्त भाग का प्रभाव उत्तर-पूर्व और शायद ओड़िशा तक सीमित हो सकता है। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे दो बड़े राज्यों में भाजपा की मौजूदगी लगभग शून्य है। यहां क्षेत्रीय पार्टियों से सामना करने में भाजपा नाकाम रही है। इसलिए, इन सभी गणनाओं को ध्यान में रखते हुए, ऐसा लगता है कि भाजपा को 215-225 सीटें मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा यदि भाजपा को इस साल राज्यों के विधानसभा में चुनाव मे झटका लगता है तो इसका नकारात्मक प्रभाव लोकसभा चुनाव में भी देखने को मिलेगा। ये ट्रेंड लाइन नीचे की ओर जा रही है, मुख्यतः अगर विपक्षी पार्टियां यह समझ जाएं कि एकता एवं अस्तित्व का सीधा रिश्ता है, इंतजार क्यों करना?

2. संरचनात्मक सुधारों की अनुपस्थिति में वादों को पूरा कर पाना मुश्किल है-– जैसा कि हर सरकार जानती है, वादे और उसकी आपूर्ति के बीच में बड़ा अंतर है। आज भारत के सामने किसानों की आय और युवाओं के लिए रोजगार की कमी दो सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। इन दोनों समस्याओं को अगले 12 महीनों में हल कर पाना मुश्किल है। इन समस्याओं को हल करने का सही समय 2014-15 था, जब कृषि,श्रम कानुन और शिक्षा तथा अन्य क्षेत्रों में आवश्यक संरचनात्मक सुधार की आवश्यकता थी। जितना समय जाएगा लोगों का गुस्सा उतना ही बढ़ेगा, फिर इंतजार क्यों करना? भविष्य में वादे पूरे करने लिए बजट का उपयोग करें, और जल्दी चुनाव करवाने के लिए ‘फील गुड’ भावना का उपयोग करें।

3. विकास के लिए सीमित निधि / भव्य योजनाएं-आने वाले समय में केंद्र सरकार के पास अतिरिक्त निधि सीमित हो सकती है, इसका मुख्य कारण है-जीएसटी, ईंधन की कठोर कीमतें और ऋण की खराब स्थिति में बैंकों का पुनर्पूंजीकरण होने से राज्यों की देय राशि सीमित हो सकती है। जिससे वर्तमान में हम जहां है वहां से हमारी आर्थिक स्थिति में बदलाव आना मुश्किल है, इसलिए इंतजार क्यों करना?

4. मानसून की अनिश्चितता- इस बार दो बार अच्छे मानसून देखने को मिले। एक अनिश्चित मौसम के चलते और दूसरी बार अल-निनो पद्धति के परिणामों के कारण, हॅटट्रिक की अपेक्षा करना बहुत ज्यादा होगा। औसत से कम वर्षा होने से ग्रामीणवासियों की भावनाएं आहत हो सकती हैं, जो लगभग आधे मतदाताओं की संख्या के बराबर हैं। अधिक कर्जमाफी के लिए फंड की आपूर्ति करना मुश्किल है, इसलिए इंतजार क्यों करना?

5. आश्चर्य कारक-आश्चर्य की बात यह है कि इस युद्ध में आधी से अधिक लड़ाई जीती जा चुकी है। किसी ने उम्मीद नहीं की होगी कि मार्च-अप्रैल 2018 में चुनाव हो सकते हैं हालांकि लोगों का मानना है कि इस वर्ष नवंबर के बीच या अगले साल मई के बीच में कभी भी चुनाव हो सकते हैं। इसलिए भाजपा विपक्षियों को आश्चर्य में डाल सकती है। सत्तारूढ़ सरकार के पास हमेशा चुनाव के लिए योजनाएं और स्त्रोत मौजुद होते हैं। इसलिए, इंतजार क्यों करना?

6. विपक्ष अभी तक एकजुट नहीं हुआ है-जितना ज्यादा समय विपक्षियों को मिलेगा उतना ही उनके एकजुट होने व गठबंधन करने की उम्मीदें बढ़ती जाएंगी। कांग्रेस का भाग्य उभरता हुआ है, इसलिए उन्हें और समय क्यों देना? अपने अंतिम कार्यकाल के दौरान खुद को प्रभावहीन बनाकर कांग्रेस ने भाजपा और श्री नरेंद्र मोदी को गति (मोदी लहर) बनाने का समय देकर गलती की थी। यदि उन्होंने एक साल पहले चुनाव किए होते तो कांग्रेस 44 नहीं बल्कि100 से अधिक सीटें जीत सकती थी। हर बीतते महीने के साथ, विपक्ष के खाते में सीटों की संख्या बढ़ने की संभावना बढ़ती जाएगी। इसलिए, इंतजार क्यों करना?

हालिया घटनाओं के आधार पर छह अनुमानित कारण

1. 2 साक्षात्कार –प्रधानमंत्री ने सप्ताह के अंत के दो दिनों में दो साक्षात्कार दिए। यह असामान्य है। जिससे सवाल उठता है कि क्यों और अभी ही क्यों? पिछले साढ़े तीन साल में प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए कितने साक्षात्कार हमें याद आते हैं?

2. रिपबल्कि टीवी के सर्वेक्षण का समय- रिपबल्कि टीवी ने सी-वोटर सर्वेक्षण का हवाला देते हुए कहा कि लोकसभा में एनडीए को 335 सीटों पर जीत हासिल होगी। एक बार फिर से चुना गया समय महत्वपूर्ण है। अभी क्यों? शायद यह भाजपा की चुनावी ताकत का संकेत देने और क्षेत्रीय तथा अन्य दलों के लिए सुझाव है कि शहर में एकमात्र खेल भाजपा का ही है। (जैसा कि मैंने ऊपर बताया, एनडीए को 335 सीटें मिलने का अनुमान भाजपा की ताकत से काफी अधिक है।)

3. दावोस में प्रधानमंत्री– भारत की बढ़ती ताकत को दिखाने के लिए प्रधानमंत्री के दावोस दौरे को भरपूर कवरेज हासिल होगी, विश्व के नेताओं और मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के साथ प्रत्येक बैठक के चित्र उपलब्ध हो यह सुनिश्चित किया जाएगा। तत्काल चुनाव के लिए बहुत ही अच्छी पृष्ठभुमि का निर्माण किया जा रहा है।

4. गणतंत्र दिवस के परेड में मुख्य अतिथि के तौर पर आसिसान देशों के नेताओं का शामिल होना-केगणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली में ‘आसियान देशों’ के 10 नेता उपस्थित होंगे। यह एक बार फिर से प्रधानमंत्री और भारत के कद को बढ़ाता है। तत्काल कार्रवाई के लिए एक बहुत ही अच्छी पृष्ठभूमि भी।

5.जल्द ही लोकालुभावन बजट- 1 फरवरी को पेश होनेवाला बजट भाजपा सरकार का आखिरी बजट होगा। जैसा कि उम्मीद है इस बजट में विभिन्न वर्गें के लिए कई लोकलुभावन वादें होंगे। प्रधानमंत्री ने अपेक्षाओं पर ध्यान दिया है यह कहकर कि उन्हें रियायतों पर विश्वास नहीं है, इसलिए उन्होंने सभी को नए नाम दिए हैं। आम जनता को राजनीतिक या आर्थिक गतिविधियों पर आधारित न्यूज 90 दिनों से ज्यादा याद नहीं रहते, बजट के बाद यदि फील गुड भावना का विस्फोट हो इसलिए यही सही समय है। भाजपा को इस कार्यकाल में ऐसा मौका दुबारा नहीं मिलेगा।

6. एक साथ चुनाव, अंतिम बलिदान –एक साथ होने वाले चुनाव को लेकर बढ़ती सुगभुगाहट, प्रधानमंत्री के लिए अंतिम बलिदान के लिए पृष्ठभुमि तैयार करती है- सत्ता का एक साल कम होने से भारत के ऊपर से बड़ा खर्च कम हो जाएगा। लोकसभा चुनाव आगामी मार्च-अप्रैल में होने से कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तमिल नाडू, दिल्ली, महाराष्ट्र राज्यों के चुनाव से साथ संयुक्त रूप से हो सकते हैं, जो देश के मतदाताओं का एक तिहाई भाग हैं। स्वच्छ भारत के लिए यह एक बड़ा कदम साबित हो सकता है। इसके अलावा, इन राज्यों के चुनाव को लोकसभा से जोड़ने से इन राज्यों में भाजपा के चुनाव जीतने की संभावना बढ़ जाती है।

इसलिए, यदि इन सभी मुद्दो को देखा जाए तो, भाजपा मार्च-अप्रैल में चुनाव की मांग क्यों नहीं कर सकती है? इंतजार क्यों करना?