फ्रेडरिक बास्टिएट का प्रसिद्ध व्यंग्य- ‘याचिका रोशनी करने वालों की’- भाग:2

पिछले ब्लॉग- फ्रेडरिक बास्टिएट का प्रसिद्ध व्यंग्य- ‘याचिका रोशनी करने वालों की’ में आपने पढ़ा कि सरकार द्वारा किसी उद्योग को बिना किसी तर्क के आधार पर संरक्षण देना किस तरह उपभोक्ताओं के लिए नुकसानदेह है साथ ही यह प्रकृति के विरुद्ध भी है। आज के इस भाग में फ्रेडरिक बास्टिएट के दिए गए तर्क पढ़ेंगे-

फ्रेडरिक बास्टिएट ने इस याचिका के माध्यम से सरकार पर व्यंग्य किया है कि सरकार हमेशा उत्पादकों का ही फायदा देखती है इसके लिए भले ही उसे प्राकृतिक संसाधनों पर पाबंदी लगानी पड़े। घरेलू उद्योगों के हितों की रक्षा के चलते सरकार उपभोक्ताओं को नुकसान में डाल देती है। उन्होंने सरकार की संरक्षणवादी नीतियों पर भी तंज कसा है कि इससे बेवजह सरकारी हस्तक्षेप बढ़ता है। देश में आयात को बाधित करने घरेलू उत्पादक अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार पर अपने उत्पादों की गुणवत्ता और तकनीकी में जरूरी सुधार पर ध्यान नहीं देते। अगर कोई उत्पाद घरेलू उत्पाद की तुलना में बहुत ही कम लागत में आयात किया जा सकता है और इससे सीधे तौर पर उपभोक्ताओं को फायदा होता है तो इससे इनकार नहीं करना चाहिए।

इस भाग में फ्रेडरिक बास्टिएट ने अपने तर्कों से सरकार की नीतियों को खारिज कर दिया है और उत्पादकों का पक्ष लेने के लिए सरकार की तीखी आलोचना भी की है। सरकार को चाहिए कि वो ऐसी मूलभूत सुविधाएँ, संपत्ति का अधिकार और कानून उपलब्ध कराए जिससे उपभोक्ता और उत्पादक बिना किसी अवरोध के व्यापार कर सकें। पढ़िए याचिका का अगला और अंतिम भाग-

हमारा जवाब तैयार हैः

आपके पास अब उपभोक्ता के हितों को चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं है। जब भी आपने उपभोक्ताओं के हितों को निर्माताओं के खिलाफ पाया, आपने उसके हितों की बलि चढ़ाई। आपने ऐसा उद्योगों को प्रोत्साहन देने और रोजगार बढ़ाने के लिए किया। अतः इस समय भी इन्हीं कारणों से ही आपको ऐसा करना होगा।

निश्चित तौर पर आपको इस आपत्ति का पूर्वाभास हो गया था। जब आपको यह बताया गया था कि लोहे, कोयले, तिल, गेहूं और कपड़ों के मुक्त व्यापार में उपभोक्ता की भी भागीदारी है। हां‘, में आप जवाब देते हैं, ‘लेकिन उत्पादकों का हित उनके निषेध में है।अच्छी बात, निश्चित तौर पर, अगर उपभोक्ताओं का प्राकृतिक प्रकाश के आने पर अधिकार है तो उत्पादकों का अधिकार है उसकी रोक पर।

आप अब भी कह सकते हैं, “लेकिन उत्पादक और उपभोक्ता तो एक ही व्यक्ति हैं। अगर निर्माता को संरक्षण से मुनाफा होता है तो वह किसानों को भी समृद्ध बना देगा। इसके विपरीत अगर कृषि समृद्ध हुई तो यह तैयार माल (मैन्युफैक्चर्ड गुड्स) के लिए बाजार को खोल देगा।” बहुत अच्छे, अगर आप हमें दिन में प्रकाश  के उत्पादन का एकाधिकार दे देते हैं तो हम बड़ी मात्रा में चर्बी, चारकोल, तेल, रेज़िन, मोम, अल्कोहल, चांदी, लोहे, कांसे और क्रिस्टल की खरीदी करेंगे ताकि उद्योगों को उसकी आपूर्ति कर सकें। ऐसे में समृद्धि हासिल करने वाले हम और हमारे सप्लायर साथी अमीर बनने के बाद वस्तुओं का बड़ी मात्रा में उपभोग कर सकेंगे और इससे घरेलू उद्योग के सभी क्षेत्रों में समृद्धि फैल जाएगी।

क्या आप कहेंगे कि सूरज की रोशनी तो कुदरत की तरफ से दिया गया मुफ्त तोहफा है और ऐसे तोहफे को ठुकराना तो संपत्ति को हासिल करने के उपाय खोजने के बीच उसे ठुकराने की तरह होगा।

लेकिन अगर आप इस स्थिति को लेते हैं, तो आप अपनी पॉलिसी पर एक जानलेवा झटका लगाते हैं; याद रखें कि अब तक आपने हमेशा विदेशी सामानों को बाहर रखा है क्योंकि अनुपात में वे मुफ्त उपहारों का अनुमान लगाते हैं। लेकिन अगर आप फिर भी ऐसा ही करते हैं तो आप अपनी ही नीति को नैतिक आघात पहुंचा देंगे। याद है आपने अभी तक विदेशी सामान को इसलिए ठुकराया था क्योंकि आपकी राय में यह मुफ्त तोहफे की तरह था। अन्य लोगों के एकछत्र अधिकारों की तुलना में हमारी याचिका को ठुकराने के लिए आपके पास शायद महज आधे भी ऐसे सही कारण नहीं होंगे, जो कि आपकी नीति के अनुसार हों। केवल इसलिए हमारी मांग को ठुकराना कि वह दूसरों से बेहतर हैं तो वह ऐसा ही होगा कि इस समीकरण को स्वीकार लिया जाए कि + ✕ + = -; होता है  तो यह निहायत ही बेहूदा तर्क होगा।

एक वस्तु के उत्पादन में श्रम और प्रकृति अलग-अलग अनुपात में काम करते हैं जो देश और जलवायु पर निर्भर करता है। जिसमें प्रकृति का योगदान हमेशा नि:शुल्क होता है और इसमें जो मानव श्रम लगता है उसी से मूल्य निर्धारित होता है और उसी का भुगतान किया जाता है।

अगर लिस्बन का संतरा पेरिस के संतरे से आधे दामों पर बिकता है तो ऐसा सूरज की प्राकृतिक गर्मी के कारण होता है जो वहां के किसानों को बिना किसी दाम के मिलता है जबकि पेरिस के किसानों को संतरों को तैयार करने के लिए कृत्रिम गर्मी का भी सहारा लेना पड़ता है और इस कृत्रिम गर्मी की कीमत बाजार से ही तो वसूली जाएगी। इसीलिए जब कोई संतरा पुर्तगाल से हमारे यहां पर पहुंचता है तो हम कहते हैं कि हमें यह आधा मुफ्त मिल रहा है, यानी पेरिस के संतरों की तुलना में आधे दाम में।

अब, संक्षेप में कहा जाए तो इसके आधे निःशुल्क (इस शब्द के लिए माफ करें) होने के आधार पर जिसे आप बनाए रखते हैं उसे प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। आप पूछते हैं, “फ्रांसीसी श्रमिक को पूरा काम करना पड़ता है जबकि विदेशी श्रमिक का आधा काम तो सूरज ही कर देता है, तो ऐसे में फ्रांसीसी श्रमिक विदेशी श्रमिक से कैसे प्रतिस्पर्धा कर सकता है?” लेकिन अगर तथ्य यह है कि अगर किसी उत्पाद का आधी कीमत पर होना आपको उसे प्रतिस्पर्धा से खारिज करने के लिए बाध्य कर देता है, तो फिर आप पूरी तरह से निःशुल्क प्राकृतिक देन (सूरज की रोशनी) को भला कैसे प्रतिस्पर्धा में रहने दे सकते हैं? या तो आप अपनी नीतियों को लेकर पुख्ता नहीं है या फिर आपको आधी कीमत वाली वस्तु को घरेलू उद्योगों के लिए नुकसानदेह करार देकर दोबारा निःशुल्क वस्तु को ज्यादा सशक्त कारणों और जोश के साथ प्रतिबंधित कर देना चाहिए।

एक और उदाहरण लेते हैं- जब कोई उत्पाद जैसे- कोयला, लोहा, गेहूं या कपड़ा विदेश से हमारे पास आता है और हम इसे अपने यहां पर उत्पादन की तुलना में सस्ती मजदूरी में हासिल कर सकते हैं, तो यह अंतर निःशुल्क तोहफा ही तो है जो हमें दिया गया है। इस तोहफे का आकार लाभ के अंतर के अनुपात में है। अगर विदेशी हमसे इसकी कीमत का तीन चौथाई, आधा या एक चौथाई मांगते हैं तो इस निःशुल्क तोहफे का मूल्य क्रमशः एक चौथाई, आधा और तीन चौथाई होगा। यह तभी पूरा हो सकता है जब दाता, प्रकाश देने वाले सूर्य की तरह हमसे कुछ नहीं चाहता। अब जो सवाल हम आपसे औपचारिक रूप से पूछना चाहते हैं वो यह है कि आप फ्रांस के लिए क्या चाहते हैं- बिना किसी शुल्क के उपभोग का लाभ या फिर सशर्त उत्पादन के कथित लाभ? अपना विकल्प चुन लीजिए, लेकिन यह तार्किक हो। क्योंकि जैसा कि आप करते हैं, अगर आप विदेशी कोयले, लोहे, गेहूं और टेक्सटाइल पर इस लिहाज से प्रतिबंध लगाते रहेंगे कि एक दिन अनुपातिक मूल्य शून्य तक पहुंच जाए तो क्या सूरज की रोशनी को अपने देश तक आने देना कितना असंगत होगा, वह रोशनी जो हर दिन हर वक्त मुफ्त में उपलब्ध रहती है।