एक समृद्ध कल की ओर!

नयी दिशा –भारतीयों को समृद्ध बनाने के लिए घोषणापत्र

राजेश जैन

गरीबी, भारतीयों का भाग्‍य नहीं है। भारत के पास जितने संसाधन यानि सोर्स हैं उस हिसाब से इसे सबसे धनी, सम्‍पन्‍न और विकसित देश होना चाहिए लेकिन हम अभी भी विकासशील बने हुए हैं और विकसित बनने की दौड़ में लगे हुए हैं। भारतीय लोगों का मुख्‍य कर्तव्‍य है कि वो देश को सम्‍पन्‍न बनाने में अपना सहयोग दें लेकिन कई अनदेखे और गंभीर कारणों के चलते ऐसा संभव नहीं हो पाता है। हमारे देश में फैली गरीबी का प्रमुख कारण, बेकार शासन, अल्‍पपालिका नेतृत्‍व और बुरी नीतियां हैं। समय आ गया है कि हम सभी इन परिस्थितियों को एक चुनौती के रूप में स्‍वीकार करें और शासन व राजनीति का एक नया मॉडल सामने लाएं। देश में एक बदलाव की आवश्‍यकता है और ऐसा हमारे व आपके सोचने व कुछ करने से ही संभव होगा।

राजेश जैन तकनीकी क्षेत्र में एक प्रसिद्ध व्‍यवसायी हैं, जिन्‍हें एशिया में डॉटकॉम के क्षेत्र क्रांति लाने वाले व्‍यक्‍ति के रूप में भी जाना जाता है। 90 के दशक में उन्‍होंने भारत का पहला इंटरनेट पोर्टल शुरु किया था। इसके बाद उन्‍होंने वर्तमान में स्‍थापित भारत की सबसे बड़ी डिजीटल मार्केटिंग कंपनी की स्‍थापना की। राजेश ने ना केवल अपने व्‍यवसाय को आगे बढ़ाया बल्कि उन्‍होंने देश के डिजीटल विकास में भी अहम भूमिका निभाई है। राजेश का मानना है कि भारत में बदलाव की जरूरत है और इस क्षेत्र में क्रांति लाने के लिए राजनीतिक क्षेत्र में आवश्‍यक बदलाव लाने की जरूरत है।

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1. भारत अभी तक गरीब क्‍यूँ है?

2014 में बीजेपी की जीत के बाद, लोगों को आस नहीं बल्कि पूरी उम्‍मीद थी कि ये सरकार कुछ बेसिक बदलावों को करेगी और पिछले सात दशकों से जो काम बिगड़ रहे थे, जो कमियां आ गई थीं, वो सभी सुधर जाएगी। साथ ही भारत एक बार फिर से विकास के रास्‍ते पर चल पाएगा। हालांकि, कई शुरूआत की गई, वहीं पुरानी नीतियों जिनकी वजह से भारत एक गरीब राष्‍ट्र के रूप में तब्‍दील हो गया था, नई सरकार के कार्यकाल में भी जारी रहीं।

इससे एक बात तो साफ होती है कि सभी पार्टियों का मकसद सिर्फ एक ही होता है कि वो किसी भी तरह से सत्‍ता में आ जाएं, अगला चुनाव जीत जाएं और उनका शासन राज्‍य-दर-राज्‍य बढ़ता हुआ पूरे देश में हो जाये। चुनाव उन लोगों के द्वारा जीता जाता है जो अच्‍छी बातें करना जानते हैं लेकिन जब बात अच्‍छी नीतियों को लागू करने की बात आती है तो वे अक्‍सर फेल हो जाते हैं।

सच्‍चाई तो यह है कि सरकारें देश में समृद्धि या सम्‍पन्‍नता नहीं लाती बल्कि लोग लाते हैं। सरकारें सिर्फ लोगों के लिए एक अच्‍छा माहौल बनाती हैं। बुरी सरकारों ने ब्‍यूरोक्रेटिक लाल-फीताशाही, भ्रष्‍टाचार और उच्‍च करों के द्वारा सिर्फ आगे बढ़ने के रास्‍ते का गला घोंटा है। भारत सरकार की 'लाइसेंस परमिट कोटा नियंत्रण' ने देश को गरीबी के उसी स्‍तर पर लाकर खड़ा करने का काम कर दिया, जो आजादी से पहले ब्रिटिश सरकार ने किया था।

130 करोड़ से अधिक भारतीयों की जिन्‍दगी इस बात पर निर्भर करती है कि हम क्‍या करते हैं। अब हमें और अधिक समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। हमें देश को सरकार की गड़बड़ी से मुक्‍त बनाना है। हमें वो सब कुछ कर दिखाना होगा जोकि हम कर सकते हैं और इस बारे में बच्‍चों को बताना होगा कि ''हमने भारत की दिशा बदलने के लिए सबकुछ किया।

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2. भारत की सरकार ने भारत को गरीब क्‍यों रखा है?

भारत आजाद होने के बावजूद भी आजाद नहीं है बल्कि यहां हर कोई जाति, धर्म और समुदाय की जंजीरों में जकड़ा हुआ है। सरकार अनावश्‍यक रूप से हस्‍तक्षेप करती रहती है और आर्थिक व सामाजिक गतिविधियों में संलग्‍न रहती है। सरकार में निर्णय लेना बहुत ही केन्द्रित होता है और इसे अपने ही लोगों द्वारा नकारा जाता है। सरकार द्वारा ही लोगों के धन पर नियंत्रण किया जाता है, उसका दुरूपयोग किया जाता है। इसमें कोई आश्‍चर्य वाली बात नहीं है कि भारतीय जनता आगे भी ऐसी ही गरीब रहेगी।

अब हम आपको जो आंकड़ें बताने जा रहे हैं वो देश का एक दुख:द पक्ष दिखाते हैं। भारत के 92 प्रतिशत घरों में 6.5 लाख रूपए से कम की नेटवर्थ है। भारतीय परिवारों की औसतन वार्षिक आय 1.2 लाख रूपए है जोकि लगभग प्रतिमाह 10 हजार रूपए से थोड़ी ही ज्‍यादा है। आईएमएफ की प्रति व्‍यक्ति जीडीपी रैकिंग में, भारत का स्‍थान 200 में से 126वां है। 30 करोड़ से ज्‍यादा भारतीय, आजादी के बाद भी गरीबी रेखा के नीचे ही जीवन यापन कर रहे हैं। भारत में 5वीं कक्षा तक पढ़ने वाले आधे से ज्‍यादा छात्र दूसरी कक्षा तक का ज्ञान नहीं रखते हैं। जिस देश में 30 करोड़ युवा जिनकी आयु 20 वर्ष के लगभग हो, उस देश में नौकरी एक ठहराव वाली स्थिति में है। 60 करोड़ से अधिक भारतीय आज भी 130-165 रूपए प्रतिदिन पर अपने परिवार की आजीविका चलाते हैं।

मानव विकास सूचकांक के हिसाब से, भारत का विकास निराशाजनक है। इसके पीछे मुख्‍य कारण सरकार का गलत तरीके से हस्‍तक्षेप करना है।

ये कहना गलत नहीं होगा कि देश में गरीबी का ये आलम बनाये रखने के लिए बुद्धिजीवियों ने अपनी तरकीबों का इस्‍तेमाल किया है और कई सालों से चली आ रही सरकारी नीतियों को बरकरार रखा है। देश के नागरिकों की सीमित परिसम्‍पत्तियों का मुद्रीकरण करने में असमर्थता और ऋण की अनुपलब्‍धता ने गरीबों को और गरीब बना दिया है। उच्‍च कर, लोगों की गाढ़ी कमाई को खा जाते हैं।

लोगों के साथ असमान रूप से व्यवहार किया जाता है, कई लोगों को उनके समूह के संबद्धता, धार्मिक, जाति आदि के आधार पर विशेषाधिकार मिलते हैं। कोई एक समूह कर भरता है और इसका लाभ किसी अन्य समूह द्वारा उठाया जाता है। लोगों को रोजगार और सार्वजनिक सहायता प्राप्त करने में भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है।

ब्रिटिश राज कानून जो भारतीयों की व्यक्तिगत और आर्थिक स्वतंत्रता को सीमित रूप में बांध रहे हैं, वे अभी भी कुछ प्रकार के परिवर्तन से प्रभावित हैं। निजी संपत्ति मौलिक अधिकार नहीं है - यह केवल राजनीतिक रूप से एक संवैधानिक अधिकार के तहत आता है।

जैसाकि हम सभी को पता है कि ब्रिटिश राज कानूनों को भारतीयों को निकालने, उनका शोषण करने, उन्‍हें विभाजित करने और मौन करने के लिए अधिनियमित किया गया था, ऐसे कई कानून अभी भी लागू हैं। वास्तव में, भारतीय संविधान के 395 अनुच्‍छेद का 242, सीधे भारतीय सरकार कानून 1935 से लिया गया है।

पिछले 70 वर्षों में, सरकार ने अर्थव्‍यवस्‍था में बार-बार दखलन किया है, इससे हमेशा ही लोगों के हितों की हानि हुई है। यह सैकड़ों लोग व्‍यवसायों में लगे हुये हैं और उनमें से ज्‍यादातर पैसा गंवा रहे हैं। लोगों के द्वारा दिये जाने वाले कर का भी सही उपयोग नहीं हो रहा है। यह एयरलाइन, रेलवे, बिजली उत्पादन, तेल और प्राकृतिक गैस, भारी मशीनरी, दूरसंचार, शिक्षा आदि में शामिल हैं। ये सार्वजनिक क्षेत्र इकाईयां, पूरे देश भर में बड़े स्‍वामित्‍व पर नियंत्रण बनाये रखते हैं। भूमि और अन्‍य परिसंपत्तियां का दुरूपयोग किया जाता है और इनका पूरी तरह से लाभ नहीं उठाया जाता है।

हर भारतीय परिवार इन पांच कंपनियों के नुकसान को भुगतने के लिए मजबूर है। जिससे हर परिवार को मजबूरन 4000 रूपये अदा करना होता है। इसी तरह कई औऱ भी सरकारी कंपनियां हैं, जो घाटे में चल रही है।

इन सभी क्षेत्रों में सरकार का दखलन, देश के हित में कभी सही नहीं रहा और न ही रहेगा। भारत में 'अधिकतम सरकार' का दबदबा रहा है। लेकिन अगर राष्‍ट्र का हित करना है तो देश में न्‍यूनतम सरकार की आवश्‍यकता है।

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3. बदलती सरकारों ने नतीजे क्‍यों नहीं बदल पाएं?

सत्‍ताधारी राजनीतिक दलों और नेताओं के पास भारत की दिशा बदलने के लिए कोई प्रोत्‍साहन या वजह नहीं थीं, ये शुरूआत के दौर की बात है और इस तरह, वो पुराने ढ़र्रे पर ही बढ़ते गए। उन्‍होंने औपनिवेशिक शासन को ही आधार बना लिया और भारत को निष्‍कासन व शोषण के दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया। धीरे-धीरे उनका मकसद सत्‍ता में बने रहना हो गया जिसके लिए उन्‍होंने गरीबों को शिकार बनाकर उन्हें सदा-सदा के लिए सरकार पर निर्भर बनाने लायक कर दिया और वोट की राजनीति खेलने लग गये। नतीजतन, गरीबों को लाभ न पहुँचाने वाली और सत्‍ता को बनाये रखने वाली नीतियों को देश में लागू किया जाने लगा। बाद में, ये रणनीति सभी राजनीतिक दलों ने अपना ली।

चुनावों के दौरान, बातचीत, भाषण और वोट मांगने की अपील भी उपनाम, जाति, आरक्षण, सब्सिडी और पुराने इतिहास के आधार पर होने लगी। नेता हमेशा देश की समृद्धि और उसे ऊंचा उठाने की बात करते थे लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं। राजनेता और नौकरशाह, अमीर बन गये और भारतीय जनता, जिसने आस लगाकर वोट दिया था, वो और ज्‍यादा निचुड़ गई, वो गरीब की गरीब ही रह गई।

भारत में सत्ता परिवर्तन तो हुए लेकिन नियमों औऱ कार्यप्रणाली में कोई बदलाव नहीं आए हैं। पर नियमों में बदलाव के बिना परिवर्तन लाना संभव नहीं।

परिवर्तन समय लेता है लेकिन अगर ये परिवर्तन गलत दिशा में हो रहे हैं तो इन पर लगाम कसना बहुत जरूरी है और सही दिशा में करवाना हमारा कर्तव्‍य है।

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4. दूसरे देश, भारत के मुकाबले अमीर क्‍यों हैं?

भारत की 130 करोड़ की आबादी में हर किसी का भविष्‍य एक नया आकार ले रहा है। अगर भारत के इन लोगों को पनपने का सही अवसर मिलता है तो न जाने भारत से कितने महान वैज्ञानिक, कवि, समाज सुधारक, आविष्कारक और खेल चैंपियन, पूरे विश्‍व को मिले। लेकिन वे अभी भी गरीबी के जाल में ही फंसे हुए हैं।

सन् 1750 के मुकाबले, विश्‍व के कई देश आज काफी अमीर हैं जोकि उन दिनों में गरीबी से जूझ रहे थे। आधुनिक दुनिया में समृद्धि को प्रबुद्धता के रूप में जाना जाता है जिससे गरीबी को दूर किया जा सकता है। पश्चिमी देशों में इन्‍हीं के कारण औद्योगिक क्रांति आई थी और उनका विकास हुआ था। सिंगापुर, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे अन्‍य देशों ने पिछले कुछ दशकों में अपने देश के नागरिकों को समृद्धि के चरम स्‍तर पर तेजी से पहुँचाया है।

भारत अपने एशियाई सहयोगियों के मुकाबले अपने देश की जनता को समदृध बनाने में काफी पीछे हैं। हमें अपने सरकार से सवाल करना चाहिए कि आज हम अन्य देशों की तुलना में 10 गुणा अमीर क्यों नहीं है?

जब लोग स्‍वतंत्र बाजारों में सक्षम और व्‍यापार करने के लिए स्‍वतंत्र होते हैं तो धन कमाते हैं। लेकिन भारत सरकार की नीतियां, लोगों के साथ जबरदस्‍ती करती हैं और उनकी आर्थिक स्‍वतंत्रता का गला दबाती हैं, इस तरह उनके बिना जाने ही वो गरीबी में धकेल दिये जाते हैं। आप सभी देशों को देखें तो पाएंगे कि जिन देशों में मुक्‍त व्‍यापार करना स्‍वीकार्य होता है वो आसानी से कम समय में अमीर और विकसित बन जाते हैं। सही मायनों में, भारतीयों को अब एक बार फिर से स्‍वतंत्रता की मांग करनी चाहिए, लोगों को सरकारी नियंत्रण से छुटकारे के लिए अपनी आवाज उठानी चाहिए।

यही नई दिशा का उद्देश्‍य है।

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5. नयी दिशा कैसे भारतीयों को सम्‍पन्‍न बनाएगी?

'नयी दिशा' उन भारतीयों को एक साथ लाने का एक ऐसा मंच है जो भारत को समृद्ध बनाना चाहते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य स्वतंत्रता, समानता और धन निर्माण के एजेंडे पर नागरिकों को एकजुट करना है। .

नयी दिशा के 5 समृद्धि सिद्धांत और 5 शुरुआती समाधान भारत में शासन और राजनीति के लिए एक नया मॉडल तैयार करेंगे।

समृद्धि या सम्‍पन्‍नता सिद्धांत: शासन के लिए एक नया मॉडल

हर सफल इकाई की तरह, भारत में भी सिद्धांतों का एक समूह होना चाहिए जिसमें से सभी शासन और नीतियों को निकाला जाये। इन सभी सिद्धांतों को नागरिकों के द्वारा समझा जाना चाहिए और सभी में इसकी समझ अनिवार्य होनी चाहिए।

नयी दिशा का समृद्धि सिद्धांत 'वह सरकार सबसे अच्छी सरकार है जो कम से कम नियंत्रित करती है' के नियम पर आधारित है। यह सिद्धांत भारत को एक उदार समाज बनाने में सहायता करेंगे, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति एक सिद्धांत और सरकार एजेंट के रूप में कार्यरत रहेगी। सभी नीतियां इन सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए।

1.स्‍वतंत्रता: सरकार किसी भी उस स्‍वतंत्रता को नहीं छीन सकती है जिस पर नागरिक का जन्‍मसिद्ध अधिकार हो। नागरिकों को बोलने और अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता और सम्‍पत्ति का अधिकार निश्चित रूप से दिया जाना चाहिए। सरकार को सभी लोगों को एकसमान अधिकार देने चाहिए और इस बात का ध्‍यान रखना चाहिए कि कोई एक व्‍यक्ति अन्‍य व्‍यक्तियों के अधिकारों का हनन न करे।

2. गैर-भेदभाव: सरकार को नागरिकों के बीच किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करना चाहिए। किसी भी जाति, धर्म या समुदाय के आधार पर सरकार द्वारा किया जाने वाला भेदभाव या लिया गया कोई निर्णय सही नहीं है।

3. गैर-हस्‍तक्षेप: सरकार को नागरिकों के आपसी आदान-प्रदान में हस्‍तक्षेप नहीं करना चाहिए। सरकार की भूमिका, अवसरों की समानता सुनिश्चित करने की होती है न कि परिणामों को थोपने की।

4. सीमित शासन: सरकार को व्‍यवसाय और वाणिज्यिक गतिविधियों में शामिल नहीं होना चाहिए। सरकार को केवल मूलभूत कर्तव्‍यों में शामिल किया जाना चाहिए न कि उन्‍हें उसमें हस्‍तक्षेप करना चाहिए। उनके मूलभूत कर्तव्‍यों में जनता को आवश्‍यकता की चीजें प्रदान करना निहित है।

5. विकेन्द्रीकरण: सहायक प्राधिकरण के तहत, प्रशासन मामलों को केंद्रीय प्राधिकरण की बजाय, लोगों के निकट सक्षम प्राधिकारी द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए।

शुरूआती समाधान

नई दिशा के द्वारा अनुमान है कि भारत की सार्वजनिक संपत्ति (भूमि, खनिज और अन्य संसाधनों, और सरकारी स्वामित्व वाली निगमों सहित), 20 खरब डॉलर से अधिक है। इसका मतलब है कि प्रत्‍येक भारतीय परिवार के लिए 50 लाख रूपए कम से कम हैं।

नयी दिशा के दो प्रमुख समाधान है - प्रति परिवार प्रति वर्ष 1 लाख रूपए और 10% पर करों का कैपिंग से प्रत्येक परिवार को लगभग 1.5 लाख का वार्षिक लाभ होगा। आम जनता के हाथों में अधिक पैसें आने से विकास की रफ्तार तेज व नयी दिशा में आगे बढ़ेगी, गरीबी खत्म होगी तथा रोजगार के अधिक अवसर पैदा होंगे। जिससे निजी निवेश औऱ आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा। इसका लाभ यह होगा कि वर्तमान में कई कमियों से जुझ रहे सार्वजनिक क्षेत्रों को अतिरिक्त साधन संपदा उपलब्ध होंगे औऱ राज्य संपन्न बनेंगे।

नयी दिशा के अन्य तीन समाधान अच्छे शासन सुनिश्चित करने के बारे में हैं - देश में हर संपत्ति को उचित टाईटल प्रदान कर यह सुनिश्चित करना है कि आम लोगों के पास उनका मालिकाना हक प्राप्त हो, जिससे सरकार मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराने तथा समय पर न्याय देने में अधिक सक्षम बनेगी।

1. सार्वजनिक संपत्ति की वापसी प्रति परिवार प्रति वर्ष 1 लाख

यह भारत के सार्वजनिक संपदा में हर भारतीय परिवार का हिस्सा है जो कि सरकार के नियंत्रण में रहता है। धन का इस तरह से वितरण करना, गरीबों को समृद्ध बना देगा और उनकी मूलभूत आवश्‍यकताएं पूरी हो जाएगी, वो आर्थिक रूप से मजबूत हो जाएंगे। लोग जानते हैं कि उन्हें किसी भी सरकारी अधिकारी की तुलना में बेहतर चाहिए, और लोग अपना पैसा अधिक सलीके से खर्च करना भी जानते हैं।

लोगों को दी जाने वाली यह धनराशि, सरकार की बेकार योजनाओं, खर्चों और अक्षम कार्यों को समाप्‍त करके एकत्रित की जा सकती है, सरकार कुछ ऐसे कार्य भी करती है जिनसे उसे कोई फायदा नहीं होता है, उन्‍हें भी बंद करने की आवश्‍यकता है। उच्‍च उत्‍पादकता, सरकारी नियंत्रण से अर्थव्‍यवस्‍था को मुक्‍त करने के लिए सही है। इससे भारतीयों को फायदा पहुँचेगा और सभी की आर्थिक स्थिति संतुलित हो जाएगी।

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2. 10% की टैक्स कैप

भारत में किसी प्रकार का कोई टैक्‍स यानि कर नहीं होना चाहिए - व्‍यक्तिगत, कॉरपोरेट और जीएसटी को 10% तक करना चाहिए। सरकार को कर को लेकर उचित मानक बनाने चाहिए जिससे लोगों की वो गाढ़ी कमाई रोजमर्रा के खर्चों के बाद बचती है, उसका सदुपयोग हो पाये। सरकार को करों में छूट देने और लोगों को इससे मुक्‍त करने के बारे में सोचना चाहिए।

3. 1000 दिन में संपत्ति को उचित टाईटल प्राप्त हो

अपनी पुस्तक "द मिस्ट्री ऑफ कैपिटल में, हरनडो डी सोतो का कहना है कि ‘इन [गरीब] राष्ट्रों के गरीब निवासियों-मानवता का 5/6 हिस्से में-कुछ वस्तुएं हैं, लेकिन उनके पास उनकी संपत्ति का प्रतिनिधित्व करने और पूंजी बनाने की प्रक्रिया की कमी है। उनके पास घर है लेकिन उसके टाईटल (कानुनी हक) नहीं है,फसलें हैं लेकिन उसके दस्तावेज नहीं है, व्यव्साय है लेकिन उसे स्थापित करने के लिए कोई सुविधा नहीं है...नतीजतन, इनमें से अधिकतर निवेश से वंचित हो चुके हैं, उसी प्रकार जिस तरह एक कंपनी, अपनी पूंजी से खाली हो जाती है जब वह अपनी संपत्ति व आय से कम सिक्युरीटीज जारी करती है। गरीबों के उद्यम काफी हद तक उन निगमों की तरह है जो शेयर औऱ बाँड जारी करके नए निवेश व पूंजी नहीं प्राप्त कर पाते हैं।

अनेक लोग जिन घरों में रह रहे हैं उनके टाईटल अस्पष्ट हैं। यह छोटी दुकानों पर भी लागू होता है। जिसके परिणामस्वरूप उस जगह पर उनका कब्जा जरूर है लेकिन इस संपत्ति का संपार्श्विक में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है, इस प्रकार मालिक के लिए संपत्ति का मुद्रीकरण करना सीमित हो जाता है।

मुकदमेबाजी का प्रमुख कारण है संपत्ति का स्पष्ट टाईटल नहीं होना। विवाद का मतलब है, संपत्ति का उपयोग मुद्रीकरण या उत्पादकता के लिए नहीं किया जा सकता है। भारत में, भूमि विवाद हिंसा के सबसे बड़े कारणों में से एक है।

अब यह संभव है कि सेटेलाइट डेटा के साथ ऑन ग्राऊंड टेक्नोलोजी की सहायता से मानचित्र पर हर संपत्ति को दिखाया जा सकता है तथा तीन वर्षों से भी कम समय में हर संपत्ति के लिए स्पष्ट टाईटल प्रदान किया जा सकता है।

4. अच्छी सरकार के लिए 1 खरब डॉलर

एक अच्छी सरकार सार्वजनिक वस्तुओं के प्रावधान के बारे में है-जो चीजें केवल सरकार कर सकती हैं, और जो सरकार के मुख्य कार्य हैं। भारत की सरकारें सैकड़ों अन्य चीजें करती हैं और मूल बातों पर समझौता करती हैं। इसका मतलब है कि:

  • आधुनिकीकरण में निवेश करके रक्षा बलों को मजबूत करना
  • एक कुशल, उच्च प्रशिक्षित, पेशेवर पुलिस बल का निर्माण करना
  • न्यायपालिका को अधिक संवेदनशील और कुशल बनाना
  • शहरी बुनियादी ढांचे में निवेश करना - मौजूदा शहरों का उन्नयन और नए शहरों के निर्माण का करना
  • सेवाएं प्रदान करने के लिए ग्रामीण बुनियादी ढांचे का निर्माण करना

5. समय पर न्याय

एक कार्यशील न्याय प्रणाली एक समृद्ध समाज की नींव है। न्याय में देरी, न्याय से वंचित रखने के समान है। सरकार को सभी नागरिकों को अवपीड़न से बचाना होगा और समय पर न्याय दिलाना होगा।

न्यायपालिका को ए-3-2-1 फॉर्मले का पालन करना चाहिए-3साल सभी लंबित कैसो को समाप्त करने के लिए, 2 साल नए मामलों पर फैसला लेने के लिए और 1 साल अपील के समाधान के लिए।

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6. अगला कदम क्‍या है?

पिछले 70 वर्षों में, भारत पर शासन करने वाले समृद्ध हो गए लेकिन इसकी जनता अभी भी गरीब है। समय आ गया है कि आप सभी मिलकर एकजुटकर भारत को पुन: सोने की चिडि़या बनाने की शुरूआत करें। अगर आप भारत को समृद्ध बनाने के मेरे इस स्‍वप्‍न को साकार करना चाहते हैं तो नई दिशा के इस मॉडल में शामिल हो और देश को बदलने की शुरूआत करें।

यहां पूछेंrajesh@nayidisha.com.

राजेश जैन को मिलो

हम भारत को समृद्ध बना सकते हैं - पीढ़ियों में नहीं, बल्कि दो चुनावों के मध्य में। 130 करोड़ से अधिक भारतीयों का भविष्य हमारे वर्तमान कार्यों पर निर्भर करता है। आइए अब हम और समय बर्बाद न करें।

एक प्रौद्योगिकी उद्यमी और एशिया के डॉटकॉम क्रांति में अग्रणी, राजेश ने 1990 के दशक के अंत में भारत का पहला इंटरनेट पोर्टल बनाया। उन्होंने तब शुरू किया, जो आज की भारत की सबसे बड़ी डिजिटल मार्केटिंग कंपनी है। राजेश एक उद्यमी रहे हैं, लेकिन एक अलग डोमेन में - राष्ट्र निर्माण।