भारत की समृद्ध विरोधी नीतियों का मुंह तोड़ जवाब देना होगा

भारत ने किस तरह समृधि विरोधी मशीन का निर्माण किया? यह एक ऐसी मशीन है, जो युवाओं की ऊर्जाओं को खत्म करने, मध्यवर्गीय परवारों की आशाओं और पैसों को दूर करने, व्यपारीयों की रचनात्मकता और ऊर्जा को बेकार जाने देना, किसानों को परेशान करना तथा सत्तारूढ़ पार्टियों और उनके करीबियों को लाभ पहुंचाने के कार्य करती है। तो इस तरह की मशीन का निर्माण किसने किया है?  

शायद ब्रिटिश सरकार ने या मुगलों ने और हो सकता है किसी और ने। पर आज हम है कहां? चाहे हम 100 साल पीछे चले जाए या 500साल इसके जवाब में कोई फर्क नहीं पड़ता। बार-बार बस एक ही सवाल उठता है कि हम देश में बदलाव के लिए कर क्या रहे हैं?

क्‍योंकि हर दिन हम कुछ ना कुछ खो रहे हैं और हर दिन करोड़ों भारतीय गरीबी में जीने को मजबूर हैं और ना तो इन करोड़ों लोगों के पास सेहत की सुविधाएं हैं और ना ही शिक्षा की गुणवत्ता, यहां तक कि नौकरी के अवसर तक नहीं हैं जिससे हम बेहतर जीवन पा सकें। रिपोर्ट्स में केवल कुछ प्रतिशत लोगों की स्थिति‍ के बारे में बताया जाता है जबकि करोड़ों लोग हर रोज़ मर रहे हैं और उनके पास खाने को अनाज तक नहीं है।

अब बताइए हम इसके बारे में क्‍या कर सकते हैं ?

कुछ सालों पहले मैंने इस बारे में सोचना शुरु किया था। एक उद्यमी के लिए हर समस्‍या एक अवसर की तरह होती है। हर बंद दरवाज़े की एक चाबी होती है। मैंने खुद से सवाल किया : इस समृद्ध विरोधी नीतियों को हटाकर समृधि की स्थापना के लिए हमें किसकी जरूरत है?

इसका जवाब पूरी तरह से साफ था : इसके लिए एक नई शुरुआत और स्‍टार्टअप की जरूरत है जो पुरानी परंपराओं और कानूनों से मुक्त हो और जिससे सिर्फ भविष्‍य और वर्तमान पर गौर किया जा सके।

यही नयी दिशा का लक्ष्य है। देश को समृधि की मार्ग पर ले जाने की जिम्मेदारी हमारी है। 1857 में शुरु हुई इस क्रांति को पूरा करने का समय आ गया है। 1942 में भी इस क्रांति को उठाया गया, लेकिन उसके बाद इस विषय को लोग भुलाते चले गए। लेकिन अब इस क्रांति को फिर से शुरु करने का समय आ गया है।

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