तलाश हैः भारत के पहले समृद्धि प्रधानमंत्री की- भाग 2

उन प्रधान मंत्रियों की बात करते हैं जिन्हें हमने वोट दिया। एक राष्ट्र के रूप में, सबसे पहले हमने जवाहरलाल नेहरू के लिए मतदान किया था। वह हमारी पहली सामूहिक गलती थी। बेशक, हमारे पास कोई और विकल्प नहीं था। गांधी ने हमारे लिए वह निर्णय लिया था- कांग्रेस के लिए कई सालों से कार्य कर रहे सरदार वल्लभभाई पटेल को एकतरफा विटो देकर। इसलिए जवाहर लाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने।

उन प्रधान मंत्रियों की बात करते हैं जिन्हें हमने वोट दिया।

एक राष्ट्र के रूप में, सबसे पहले हमने जवाहरलाल नेहरू के लिए मतदान किया था। वह हमारी पहली सामूहिक गलती थी। बेशक, हमारे पास कोई और विकल्प नहीं था। गांधी ने हमारे लिए वह निर्णय लिया था- कांग्रेस के लिए कई सालों से कार्य कर रहे सरदार वल्लभभाई पटेल को एकतरफा विटो देकर। इसलिए जवाहर लाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने। उनकी सबसे बड़ी दो भूल थी- हमारे अनुभवहीन लोकतंत्र के लिए ब्रिटिश संसदीय प्रणाली व अर्थव्यवस्था के लिए सोवियत संघ की केंद्रीय योजना का चयन करना। इन दोनों ही विषयों के लिए हमारे पास बेहतर विकल्प मौजुद थे- अमेरिकन मॉडल, एक ऐसा संविधान जो राष्ट्रपति से लेकर सरकार में विभिन्न लोगों तक शक्तियों को विभाजित करता है और व्यक्तिगत अधिकारों की गारंटी देता है। साथ ही आम जनता को अपने सपनों को पूरा करने के लिए आर्थिक स्वतंत्रता की भी गारंटी देता है।

दूसरे विश्वयुद्ध के अंत में अमेरिका ने अपने आप को सबसे शक्तिशाली देश के रूप में प्रस्तुत किया। भारत को अमेरिकी संविधान और आर्थिक मॉडल का अनुसरण करना चाहिए था। लेकिन भारत को गलत रास्ते पर धकेल दिया गया। एक ऐसा संसदीय मॉडल जो प्रधानमंत्री तक ही शक्तियों को सीमित न रखे (जैसा आपातकाल के समय देखा गया) तथा एक ऐसा आर्थिक मॉडल जो उन लोगों के हाथों में शक्ति प्रदान करता है, जिनका मानना है कि वे कीमत प्रणाली के माध्यम से बाजार में बातचीत करने वाले स्वतंत्र व्यक्तियों की निर्णय लेने की क्षमता से बेहतर जानते हैं।

समाजवाद को आगे बढ़ाने के लिए नेहरू द्वारा लिया गया निर्णय दुनिया के इतिहास में सबसे बड़ी आर्थिक भूल है-जिसने ऐसी समृद्ध विरोधी मशीन का निर्माण किया है, जिसका खात्मा करना आसान नहीं है और जिसने भारत की आजादी के बाद करोड़ो लोगों के जीवन को नष्ट कर दिया है।

एक बार जो क्रम शुरू हुआ तब उसे उलटना कठिन होता गया। प्रधानमंत्री के रूप में, उनकी बेटी इंधिरा गांधी इसे और आगे ले गयी। सरकार बढ़ी हुई – बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया, लाइसेंस-परमिट-कोटा-राज ने और भी अधिक ताकत हासिल की, उस दिन तक, जिन दिन (आपातकाल के तहत) हमारे सारे मौलिक अधिकारों को हमसे छीन लिया गया।

बेशक, हम भारतीयों ने उनके लिए वोट किया था और कुछ साल बाद फिर से उनके लिए वोट देने वाले थे तब तक समृद्ध विरोधी मशीन ने बहुत ताकत हासिल कर ली थी।